दिल्ली की इस अंधेर नगरी में सिर्फ चेहरे बदलते हैं राजनीति का गंदा तरीका कभी नहीं बदलता

उत्तर प्रदेश/न्यू दिल्ली 

जब 1986 में राजीव गांधी को मुस्लिम वोटों की फसल काटनी थी, तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला ही पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बूढ़ी बेसहारा मुस्लिम महिला ‘शाहबानो’ को उसके पति से गुज़ारा भत्ता दिलाने का आदेश दिया था, लेकिन सरकार ने मौलवियों के दबाव में आकर कानून बदल दिया और उस बेचारी महिला को बिना किसी सहारे के बीच मझधार में छोड़ दिया।

और बिल्कुल वैसा ही खेल आज की सरकार ने खेला, जब उन्हें अपना दलित वोट बैंक खिसकता दिखा, तो उन्होंने भी एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अध्यादेश लाकर कचरे के डिब्बे में डाल दिया ताकि कोई वोट छिटकने न पाए।

फिर भी ये बेशर्म नेता हमारे सामने आकर दांत निपोरते हैं और कहते हैं कि “ज़रा हमारा फ़र्क बताओ!”

अरे काहे का फ़र्क भाई? फ़र्क सिर्फ इतना है कि तुम्हारी दुकान का ग्राहक (वोट बैंक) अलग है, लेकिन माल बेचने का और जनता को ठगने का तरीका वही पुराना है।

एक तरफ तुष्टिकरण का खेल चला, तो दूसरी तरफ जातिवाद का पासा फेंका गया, लेकिन दोनों ने मिलकर देश की सर्वोच्च अदालत की गरिमा का मज़ाक उड़ाया।

इस पूरी गंदी राजनीति में अगर कोई सबसे बुरी तरह पिसा है, तो वो है इस देश का ‘गरीब सवर्ण’। इस बेचारे का दर्द समझने वाला कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ।

जनरल कैटेगरी का गरीब युवा रात-दिन आंखें फोड़कर पढ़ाई करता है, लेकिन मेरिट लिस्ट में उसका हक छीन लिया जाता है। उसके पास न तो कोई मजबूत राजनीतिक लॉबी है, न कोई रसूख और न ही कोई संगठित वोट बैंक जिसके डर से सरकारें थर-थर कांपें।

सख्त कानूनों के दुरुपयोग की सबसे पहली और सबसे घातक मार इसी गरीब सवर्ण पर पड़ती है, जिसके पास कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने के पैसे तक नहीं होते।

चुनाव आते ही ईडब्ल्यूएस (EWS) का एक छोटा सा झुनझुना थमाकर इन पार्टियों को लगता है कि इन्होंने बहुत बड़ा अहसान कर दिया, जबकि असलियत यह है कि आज भी यह वर्ग अपनी ही जमीन पर प्रशासनिक और सामाजिक भेदभाव के आंसू रो रहा है।

साफ बात यह है कि इन राजनीतिक पार्टियों का न तो कोई ईमान है और न ही कोई विचारधारा।

इनका एकमात्र भगवान ‘कुर्सी’ है और मजहब ‘वोट’ है। हिन्दुओ को अगड़े-पिछड़े, की अफीम चटाकर ये आपस में लड़ाते हैं ताकि इनकी रोटियां सिकती रहें।

जब खुद की सत्ता पर आंच आती है, तो ये संविधान की दुहाई देना बंद कर देते हैं। इस हमाम में सब के सब नंगे हैं, बस मतदाताओं को बेवकूफ़ बनाना बंद करो!

आज सवर्णों का सबसे बड़ा कष्ट क्या जानते हैँ वो यह की भाजपा सवर्णों की पार्टी हैँ सवर्णों के टैक्स का एक बहुत बड़ा हिस्सा सरकार के पास जाता हैँ और ज़ब सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी (लाभ) की बारी आती हैँ तो सरकार उन्हें भूल जाती हैँ इस सरकार में सबसे ज़्यादा शोषण व्यापारियों का हुवा हैँ अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद अंतर्गत नगर पंचायत खागा में अतिक्रमण अभियान चलाकर भाजपा सरकार ने भले ही गुड वर्क करने का प्रयास किया हैँ लेकिन जिस तरीके से व्यापारियों को परेशान किया गया ये बहुत ही निंदनीय हैँ यहाँ के व्यापारियों में भाजपा सरकार के प्रति बहुत ही आक्रोश हैँ।

अतिक्रमण अभियान नहीं अपितु लूटमार अभियान

एक व्यापारी ने अपने दर्द को बयां करते हुवे बताया की नगर पंचायत खागा के एक सफाई कर्मी के द्वारा सामान को लूटने का प्रयास किया गया जिसे किसी भी दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता हैँ ज़ब नगर पंचायत खागा के द्वारा नगर में अनाउंसमेंट किया गया की नाली के ऊपर कोई भी व्यापारी अतिक्रमण न करें तो फिर हमारी दुकाने तो नाली के पीछे थी तो फिर हमें ही क्योंकि टारगेट किया जा रहा हैँ अगर सरकारी नुमाइंदे इसी तरह अपनी मनमानी करते रहे तो भाजपा को भारी कीमत चुकानी पड सकती हैँ नतीजतन भाजपा को हार का सामना करना पद सकता हैँ।

अब सबसे बड़ा सवाल यह हैँ की क्या उतर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी का वर्चस्व धीरे-धीरे ख़त्म होता जा रहा हैँ ?

क्या सरकारी कर्मचारी अपने पद का इसी तरह दुरूपयोग करते रहेंगे और व्यापारियों का इसी तरह शोषण होता रहेगा ?

नगर पंचायत खागा के प्रतिष्ठित व्यापारियों ने अपना नाम न लिखने की स्थिति में भाजपा सरकार से कुछ मांग की हैँ।

-1 जो भी व्यापारी जी एस टी दे रहा हैँ उसे “व्यापारी पेंसन योजना” स्कीम चलाकर उसके तहत लाभ मिलना चाहिए।

-2 जाति के आधार पर ही नहीं अपितु गरीबी के आधार पर सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए वो व्यक्ति चाहे जिस वर्ग का हो ?

-3 क्या सामान्य कटेगरी में जन्म लेना आज सबसे बड़ा अभिशाप हैँ ?

अब सवाल इसलिए भी हैँ क्योंकि निम्न वर्गों के पास हर एक दल के नेता सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए खड़े रहते हैँ इन नेताओं को यह लगता हैँ की सिर्फ निम्न वर्ग का वोट लेकर ही चुनाव जीता जा सकता हैँ लेकिन जो सामान्य वर्ग में जन्म लेकर गरीबों की तरह अपना जीवन-यापन कर रहा हैँ यहाँ किसी बड़े नेता की नज़र नहीं जाती उसके पीछे भी समान्य वर्ग के लोगो की गलती हैँ इन्होने ज़्यादातर दलों को बोलकर रखा होता हैँ की हम और हमारा पूरा परिवार आपको ही वोट करेगा शायद इसी लिए इनको किसी भी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता हैँ।