बांदा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा फलोत्पादन द्वारा पोषण सुरक्षा, स्वास्थ्य सुधार एवं आजीविका सुदृढ़ीकरण विषय पर कार्यशाला का दीनदयाल शोध संस्थान, चित्रकूट में आयोजन

जनपद बांदा।

बांदा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा फलोत्पादन को पोषण सुरक्षा, बेहतर स्वास्थ्य तथा किसानों की आय एवं आजीविका सुदृढ़ीकरण का प्रभावी माध्यम बनाने के उद्देश्य से “फलोत्पादन द्वारा पोषण सुरक्षा, स्वास्थ्य सुधार एवं आजीविका सुदृढ़ीकरण” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला दिनांक 28 सितंबर 2026 को आयोजित किया गया। कार्यशाला में लगभग 50 किसानों ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया तथा फल उत्पादन की आधुनिक तकनीकों, पोषण, स्वास्थ्य एवं बाजार आधारित कृषि के विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञों से जानकारी प्राप्त की।

कार्यशाला के मुख्य अतिथि अभय महाजन, संगठन सचिव, दीनदयाल शोध संस्थान, विशिष्ट अतिथि माननीय अनिल जी सह संगठन सचिव, दीनदयाल शोध संस्थान, चित्रकूट, निर्देशक प्रशासन एवं अनुश्रवण डा. नरेंद्र सिंह, बांदा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय कुलपति प्रो. (डॉ.) एस.वी.एस. राजू, बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा ने की। कार्यक्रम में परियोजना अन्वेषक डॉ. अखिलेश कुमार श्रीवास्तव, सह-परियोजना अन्वेषक डॉ. सुभाष चंद्र सिंह तथा सह-परियोजना अन्वेषक डॉ. अर्जुन प्रसाद वर्मा सहित दीनदयाल शोध संस्थान के वैज्ञानिक एवं किसान उपस्थित रहे।

कार्यशाला का शुभारंभ अतिथियों एवं परियोजना अन्वेषक के द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। दीप प्रज्वलन के पश्चात अतिथियों का स्वागत साल एवं पुष्पगुच्छ देकर किया गया। कार्यक्रम के दौरान फलोत्पादन को केवल व्यावसायिक कृषि तक सीमित न रखते हुए इसे परिवार एवं समुदाय की पोषण सुरक्षा और स्वस्थ जीवनशैली से जोड़ने पर विशेष बल दिया गया।

मुख्य अतिथि अभय महाजन (संगठन सचिव, दीनदयाल शोध संस्थान, चित्रकूट) ने अपने संबोधन में कहा कि फल हमारे दैनिक आहार में आवश्यक विटामिन, खनिज, फाइबर एवं अन्य पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि किसानों को अपने खेतों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल विभिन्न प्रकार के फलदार पौधों को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे परिवार को पौष्टिक आहार उपलब्ध होने के साथ-साथ अतिरिक्त उत्पादन से आर्थिक लाभ भी प्राप्त हो सके।

उन्होंने फलोत्पादन को पोषण, स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ते हुए कहा कि यदि किसान उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन तक की पूरी श्रृंखला पर ध्यान दें, तो फल आधारित कृषि ग्रामीण आजीविका का मजबूत आधार बन सकती है।

कुलपति प्रो. (डॉ.) एस.वी.एस. राजू ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि बुंदेलखंड क्षेत्र में फलोत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। जलवायु एवं स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उपयुक्त फल प्रजातियों एवं उन्नत उत्पादन तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी कृषि प्रणाली को अधिक लाभकारी बना सकते हैं।

उन्होंने किसानों से वैज्ञानिकों एवं कृषि विशेषज्ञों के संपर्क में रहते हुए उन्नत पौध सामग्री, वैज्ञानिक बाग प्रबंधन, सिंचाई प्रबंधन, पोषक तत्व प्रबंधन, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा कटाई-पश्चात प्रबंधन की तकनीकों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि फलोत्पादन में गुणवत्ता एवं उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ बाजार की मांग को ध्यान में रखना भी आवश्यक है।

कुलपति बांदा कृषि विश्वविद्यालय ने बताया कि कृषि विश्वविद्यालयों का दायित्व केवल शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि विकसित तकनीकों को किसानों तक पहुंचाकर उन्हें व्यावहारिक रूप से अपनाने में सहयोग करना भी है। उन्होंने किसानों की सक्रिय सहभागिता को कार्यशाला की सफलता का महत्वपूर्ण आधार बताया। निदेशक प्रशासन एवं अनुश्रवण डा. नरेंद्र सिंह ने वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी किसानों तक पहुंचाने पर जोर दिया l

परियोजना अन्वेषक डॉ. अखिलेश कुमार श्रीवास्तव ने कार्यशाला के उद्देश्य एवं परियोजना की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि फलोत्पादन के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को पौष्टिक फल उपलब्ध कराने के साथ-साथ किसानों के लिए नियमित एवं विविध आय के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

उन्होंने किसानों को क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार फलदार पौधों का चयन, पौधरोपण की उचित दूरी, पौधों की देखभाल, सिंचाई एवं पोषण प्रबंधन तथा उत्पादन लागत को कम करने की वैज्ञानिक विधियों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक बागवानी तकनीकों के समुचित उपयोग से उत्पाद की गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों में सुधार किया जा सकता है।

सह-परियोजना अन्वेषक डॉ. सुभाष चंद्र सिंह ने फलोत्पादन में वैज्ञानिक प्रबंधन, पौध संरक्षण तथा टिकाऊ उत्पादन पद्धतियों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों को कीट एवं रोगों की पहचान समय पर करने तथा आवश्यकता के अनुसार समेकित प्रबंधन तकनीकों को अपनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि स्वस्थ पौधे ही गुणवत्तापूर्ण फल उत्पादन का आधार हैं। इसलिए बागों में नियमित निगरानी, उचित पोषण प्रबंधन, स्वच्छता तथा वैज्ञानिक पौध संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

सह-परियोजना अन्वेषक डॉ. अर्जुन प्रसाद वर्मा ने फलोत्पादन को ग्रामीण आजीविका से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि फल उत्पादन के साथ-साथ ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं स्थानीय विपणन को बढ़ावा देकर किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के अतिरिक्त अवसर सृजित किए जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि किसान केवल कच्चे फल बेचने के बजाय उपलब्ध संसाधनों एवं स्थानीय बाजार की मांग के अनुसार मूल्यवर्धित उत्पादों की दिशा में भी प्रयास कर सकते हैं। इससे उत्पाद का बेहतर मूल्य प्राप्त करने और कृषि आय को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

कार्यशाला में लगभग 50 किसानों ने सक्रिय प्रतिभाग लिया। किसानों ने फलोत्पादन से संबंधित विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों से जानकारी प्राप्त की तथा अपनी व्यावहारिक समस्याओं एवं जिज्ञासाओं को साझा किया। विशेषज्ञों द्वारा किसानों के प्रश्नों का समाधान करते हुए बागवानी को अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ बनाने के लिए वैज्ञानिक उपायों की जानकारी दी गई।

कार्यशाला के दौरान किसानों को यह संदेश दिया गया कि फलदार वृक्ष केवल आय का साधन ही नहीं, बल्कि परिवार के पोषण, स्वास्थ्य संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। घर एवं खेत के स्तर पर फलदार पौधों को बढ़ावा देने से स्थानीय स्तर पर पौष्टिक भोजन की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है।

कार्यशाला में वक्ताओं ने कहा कि पोषण सुरक्षा एवं किसानों की आर्थिक समृद्धि के लिए कृषि में विविधीकरण आवश्यक है। फलोत्पादन को अन्य कृषि गतिविधियों के साथ समन्वित करके किसान जोखिम को कम करने और आय के विभिन्न स्रोत विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञों ने किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री के चयन, वैज्ञानिक बाग प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, जल के विवेकपूर्ण उपयोग तथा उत्पादन के बाद उचित प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी।

कार्यक्रम के अंत में सह-परियोजना अन्वेषक डॉ. अर्जुन प्रसाद वर्मा ने मुख्य अतिथि अभय महाजन, विशिष्ट अतिथि अनिल, कुलपति प्रो. (डॉ.) एस.वी.एस. राजू, निदेशक प्रशासन एवं अनुश्रवण डा. नरेंद्र सिंह, परियोजना अन्वेषक डॉ. अखिलेश कुमार श्रीवास्तव, सह-परियोजना अन्वेषक डॉ. सुभाष चंद्र सिंह, संस्थान के वैज्ञानिकों, अधिकारियों, कर्मचारियों तथा कार्यशाला में प्रतिभाग करने वाले सभी किसानों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। एक दिवसीय कार्यशाला का समापन किसानों एवं वैज्ञानिकों के बीच संवाद तथा फलोत्पादन को पोषण सुरक्षा, स्वास्थ्य सुधार और सुदृढ़ ग्रामीण आजीविका का प्रभावी आधार बनाने के संकल्प के साथ हुआ।

Crime 24 Hours / ब्यूरो रिपोर्ट