जनपद बांदा।
बांदा में पर्युषण पर्व के चौथे दिन शनिवार को जैन समाज द्वारा उत्तम शौच धर्म की आराधना की गई। छोटी बाजार स्थित जैन चैत्यालय में बाल ब्रह्मचारी पंडित नन्हें भैया ने प्रवचन के दौरान उत्तम शौच धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि शौच का अर्थ केवल शरीर की स्वच्छता नहीं, बल्कि मन को लोभ, राग-द्वेष और विषय-कषायों से मुक्त करना है। मन में संतोष और आत्मिक पवित्रता का भाव उत्पन्न होना ही उत्तम शौच धर्म की वास्तविक साधना है। उन्होंने कहा कि मनुष्य बाहरी शुद्धता के लिए स्नान करता है, तीर्थों और पवित्र स्थानों पर जाता है तथा मंदिरों में पूजा- अर्चना करता है, लेकिन इन बाहरी क्रियाओं मात्र से आत्मा की शुद्धि नहीं होती। आत्मा की वास्तविक शुद्धि अपने भीतर के विकारों को दूर करने से होती है। लोभ मनुष्य को कभी संतुष्ट नहीं होने देता। जितना प्राप्त होता है, उससे अधिक पाने की इच्छा बनी रहती है। इसलिए संतोष को अपनाना और लोभ का त्याग करना उत्तम शौच धर्म का महत्वपूर्ण संदेश है।

पंडित नन्हें भैया ने कहा कि बावड़ी, तालाब, कुएं या सागर में स्नान करने से शरीर स्वच्छ हो सकता है, लेकिन आत्मा की शुद्धि तभी संभव है, जब मन के विकार दूर हों। इसी प्रकार मंदिर या शिवालय जाने मात्र से शौच धर्म की पूर्णता नहीं होती। इसके लिए मन में पवित्र विचार और आचरण में संयम आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राम-राम जपने, तप करने या माथे पर चंदन लगाने मात्र से मन पवित्र नहीं होता। यदि मन में लोभ, क्रोध, मान, माया, राग-द्वेष और अहंकार मौजूद हैं तो वास्तविक शौच धर्म की साधना अधूरी है। सच्चा शौच धर्म वह है, जिसमें मनुष्य अपने भीतर झांककर कषायों को कम करने का निरंतर प्रयास करे।

प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा:
“बावड़ी तालाब कूप सागर में स्नान किए,
होत नाहीं शौच गंगा यमुना में न्हाने से।”
इसका भावार्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि पवित्र जल में स्नान करने से शरीर की स्वच्छता तो हो सकती है, लेकिन आत्मा की शुद्धि मन के विकारों को दूर करने से ही होती है।
इसी क्रम में उन्होंने कहा:
“मथुरा वृंदावन नहीं काशी में शौच होत,
शौच नाहीं मंदिर शिवालय में जाने से।”
अर्थात केवल तीर्थस्थलों और मंदिरों में जाने से मन की अशुद्धियां समाप्त नहीं होतीं। आत्मशुद्धि के लिए भीतर के भावों को निर्मल करना आवश्यक है।
उन्होंने आगे कहा:
“राम-राम जपने से, पंच अग्नि तपने से,
होत नाहीं शौच भाल चंदन लगाने से।”
उन्होंने समझाया कि केवल जप, तप और बाहरी धार्मिक क्रियाएं पर्याप्त नहीं हैं, जब तक मन के भीतर मौजूद विकारों को दूर करने का प्रयास न किया जाए।
उन्होंने कहा:
“लालच की कीच धोय लेकर संतोष तोय,
शौच धर्म होय राग-द्वेष के मिटाने से।”
इसका भाव बताते हुए उन्होंने कहा कि लोभ रूपी कीचड़ को संतोष रूपी जल से धोना और राग-द्वेष को समाप्त करना ही उत्तम शौच धर्म का वास्तविक स्वरूप है।
पंडित नन्हें भैया ने कहा कि पर्युषण पर्व आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि का अवसर है। इन दिनों में प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर के दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का संकल्प लेना चाहिए। लोभ के स्थान पर संतोष, राग-द्वेष के स्थान पर समभाव और अशुद्ध विचारों के स्थान पर निर्मल भाव अपनाने से जीवन में वास्तविक शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। प्रवचन के उपरांत श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से नृत्य करते हुए पवित्र ग्रंथ जिनवाणी की आरती की। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जैन धर्मावलंबी उपस्थित रहे।
Crime 24 Hours / Mitesh Kumar


