जल शक्ति मंत्रालय के राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान ने गणतंत्र दिवस पर किया सम्मानित
प्रवीण पांडेय के जलनिधियों के संरक्षण पर शोध को राष्ट्रीय मान्यता
जलनिधियों को बचाने की मुहिम को राष्ट्रीय पहचान
खागा फतेहपुर ::-
जल संरक्षण एवं संवर्धन विषयक शोध पर आधारित पुस्तक “जलनिधियों को जीने दो” के लेखक एवं पर्यावरण पहरूवा प्रवीण पांडेय को राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की द्वारा संचालित तकनीकी पुस्तक लेखन पुरस्कार योजना के अंतर्गत प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह संस्थान जल शक्ति मंत्रालय, जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग, भारत सरकार के अधीन कार्य करता है।
यह सम्मान 26 जनवरी 2026 (गणतंत्र दिवस) के अवसर पर संस्थान के निदेशक डॉ. वाई. आर. यस. राव द्वारा स्मृति चिन्ह एवं प्रमाण पत्र प्रदान कर दिया गया।
इस अवसर पर निदेशक डॉ. वाई. आर. यस. राव ने कहा कि “‘जलनिधियों को जीने दो’ पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण पर आधारित एक गंभीर और उपयोगी शोध कृति है, जो जल प्रबंधन, नीति निर्माण और जन-जागरूकता के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगी।”
पुस्तक प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशित की गई है। इसमें तालाबों, नदियों, झीलों एवं अन्य पारंपरिक जलनिधियों के संरक्षण, उनके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व तथा वर्तमान समय में उत्पन्न चुनौतियों पर शोधपरक और तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
उल्लेखनीय है कि प्रवीण पांडेय (एमसीए, एमए राजनीति विज्ञान, शिक्षा शास्त्र, एमजेएमसी, एलएलबी) विद्यार्थी काल से ही सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बाल काल से स्वयंसेवक हैं तथा संघ शिक्षा वर्ग द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। इसके साथ ही वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विद्या भारती, पर्यावरण गतिविधि, गंगा समग्र सहित अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं।
वर्तमान में वे नदी, पोखर, झील, तालाब, वन, पर्यावरण तथा प्राचीन व धार्मिक धरोहरों के संरक्षण के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। वे स्थानीय समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में नियमित लेखन के माध्यम से भी जन-जागरूकता फैलाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनके प्रयासों से कई प्राचीन तालाबों और झीलों को अतिक्रमण मुक्त कराकर प्रशासनिक सहयोग से संरक्षित किया जा चुका है।
नदियों की पदयात्रा, तालाबों पर संवाद यात्रा, आरती-पूजन, तथा हरियाली संरक्षण हेतु पेड़-पौधों पर रक्षा सूत्र बांधने जैसे अनेक अभियान उनके नेतृत्व में संचालित हो रहे हैं। उन्होंने लगभग पांच वर्षों तक विप्रो और आईबीएम जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में भी कार्य किया है। वर्तमान में वे अपने पैतृक गांव स्थित शिक्षा संस्थान में निजी रूप से कार्यरत हैं।
इसके साथ ही वे बुंदेलखंड राष्ट्र समिति के संस्थापक के रूप में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित बुंदेलखंड को अखंड राज्य बनाए जाने के लिए भी संघर्षरत हैं। विभिन्न टीवी चैनलों में उन्हें समय-समय पर विश्लेषक के रूप में आमंत्रित किया जाता है।
सम्मान प्राप्त करने पर प्रवीण पांडेय ने कहा कि “यह पुरस्कार केवल एक पुस्तक का नहीं, बल्कि देश की जलनिधियों को बचाने के जन-आंदोलन की मान्यता है।” इस उपलब्धि पर सामाजिक, साहित्यिक एवं पर्यावरणीय संगठनों ने उन्हें बधाई दी है।
ब्यूरो रिपोर्ट



