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मणिकर्णिका इतिहास का वो पन्ना जिसे हर भारतीय को पढ़ना चाहिए

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Crime24hours/District Editor Fatehpur Alok Kumar Kesharwani

फतेहपुर ::-भारतीय सिनेमा एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। कुछ दशक पहले देशभक्ति की फिल्मों का दौर चला करता था। लेकिन 80-90 तक आते आते ऐसी फिल्में बननी ही बन्द हो गयी, लेकिन अब फिर से बाजी पलट रही है। ऐतिहासिक चरित्रों, घटनाओं, देशभक्ति पर फिर से फिल्में बनने लगी हैं, जो एक अच्छा बदलाव है।

इसी कड़ी में अगला पड़ाव है मणिकर्णिका। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कहानी और कविताएं हम बचपन से ही सुनते आ रहे हैं, कई बार ऐसा लगा कि इतने विराट किरदार पर आज तक कोई सलीके की फ़िल्म क्यों नही बनी। भारत एक फ़िल्मप्रधान देश है, जितना प्रभाव हमारे जन जीवन पर फिल्मों का होता है, उतना किसी और चीज का नही होता।

अगर सही संदेश और नसीहत फ़िल्म के द्वारा दी जाए, तो वो प्रभाव डालती है, चाहे रंग दे बसंती के बाद आये विरोध प्रदर्शन में बदलाव हो, चाहे मुन्नाभाई MBBS के बाद गांधीगिरी हो, 3 इडियट्स के बाद All Is well हो।

अब बात आती है मणिकर्णिका की, क्या इस फ़िल्म का कोई प्रभाव होगा? जवाब है ‘हां’

पहली बार किसी महिला निर्देशक ने एक ‘ग्रैंड’ फ़िल्म बनाई है। इस फ़िल्म ने कई मिथक तोड़े हैं।

जैसे, ऐतिहासिक फिल्मों के लिए भंसाली को एक्सपर्ट माना जाता था, लेकिन अब एक और हैं मैदान में।

इस फ़िल्म ने ये भी साबित किया है कि बिना किसी कॉन्ट्रोवर्सी के भी ऐतिहासिक फिल्में बनाई जा सकती हैं। करनी सेना ने बवाल करने की कोशिश की, लेकिन कंगना द्वारा उन्हें मुहतोड़ जवाब दिया जाना और उसके बाद करनी सेना का ठंडा पड़ जाना भी एक मिथक तोड़ता है। ये धमकियों के सिलसिले बन्द होने ही चाहिए, और राजनीतिक फ़ायदो के लिए फिल्मों को बलि का बकरा बनाया जाना बंद होगा।

एक बड़ा मिथक ये भी टूटा है कि 100 करोड़ से ज्यादा लागत की फिल्मों को चलाने के लिए सुपरस्टार्स की फौज चाहिए होती है।

और सबसे बड़ा मिथक टूटा है नारी सशक्तिकरण का, फ़िल्म में दिखाया गया है, और ये सच भी है….कि ऐसा कोई काम नही था जो नारियां नही करती थी। और ना ही उन्हें किसी से अधिकार मांगने पड़ते थे। घर चलाती रही, वो सेनापति थी, राज्य चलाती थी। भारत मे नारियां हजारो सालो से सशक्त थी, हैं और आगे भी रहेंगी। हमारे इतिहास में ही सैकड़ो ऐसे उदाहरण हैं , जिनका अनुसरण करना कहीं बेहतर है, बजाए किसी फिल्म एक्ट्रेस या नारी शक्ति के नाम पर पैसा कमाने के लिए NGO चलाने वाली महिलाओं के।

अब बात करते हैं फ़िल्म के रिव्यु की

कहानी – कहानी सब को मालूम ही है, लेकिन बात करते हैं ट्रीटमेंट की, तो वो बेहतरीन है। थोड़ी बहुत artistic freedom ली गयी हैं, लेकिन फिर भी काफी हद तक सच्चाई के काफी नजदीक है। रानी लक्ष्मीबाई का किरदार ढंग से उभारा गया है, उनके जीवन की कई घटनाओं को दिखाया गया है जिनसे उनके बारे में और जानने को मिलता है, और सम्मान भी बढ़ता है।

एक्टिंग – कंगना ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा रोल किया है, और इस साल का शायद ही कोई अवार्ड होगा जो उन्हें ना मिले। फ़िल्म में वही हैं, और बाकी सब एक्स्ट्रा लगते हैं। वो जिस भी सीन में हैं, आपको बस वही दिखेंगी, ऐसा जबरदस्त प्रभाव बनाया है कंगना ने। इसमे कुछ बुराई भी नही, जब कहानी की मुख्य पात्र ही वही हैं, तो उसी हिसाब से कवरेज भी मिलेगा।

डायलॉग्स – जबरदस्त हैं, प्रसून जोशी ने काफी समय बाद डॉयलोग्स लिखे हैं, लेकिन एक एक शब्द जबरदस्त लिखा है।

म्यूजिक – प्रसून जोशी के शब्द और शंकर-अहसान-लोय का संगीत जादुई प्रभाव जगाता है। सभी गाने अच्छे हैं, बस एक वो बिच्छु वाले गाने को छोड़ कर 😊

बैकग्राउंड स्कोर (BGM) – अमूमन लोग बैकग्राउंड स्कोर को याद नही रखते, या फिर इतना महत्वपूर्ण नही समझते, लेकिन दृश्यों को प्रभावी बनाने में BGM का बहुत बड़ा हाथ होता है। KGF और Uri को प्रभावी बनाने में BGM का बहुत बड़ा हाथ है। मणिकर्णिका में भी BGM शानदार है, या कहें कि Grand है। युद्ध के दृश्य हो, लक्ष्मीबाई के दृश्य हो, इन सभी मे BGM कमाल का है।

एक्शन – एक ही शब्द है, शानदार। मणिकर्णिका भारत की पहली फ़िल्म है, जिसमे “तोपों” की लड़ाई को ढंग से दिखाया गया है। कैमरा एंगल इतने बढ़िया है कि आप रोमांचित हो जाएंगे। और सबसे बड़ी बात है, तोप से गोला छूटने के दृश्य में VFX नही है, आप असली गोला देख रहे हैं। हाँ गोला फटते हुए दृश्य में जरूर vfx का इस्तेमाल है। कंगना ने Body double का इस्तेमाल नही किया है, और उनके एक्शन दृश्य भी अच्छे हैं, लेकिन और बेहतर किये जा सकते थे।

सिनेमेटोग्राफी – दमदार है। पहले ही दृश्य से आपको लगेगा कि फ़िल्म का स्केल बहुत ऊंचा है, उसका कारण है बढ़िया सिनेमेटोग्राफी। कुछ vfx वाले दृश्यों को छोड़ दें, तो अन्य जगह कैमरे का काम बहुत शानदार है।

VFX – अब चूंकि सभी हॉलीवुड की फिल्में देखते हैं, और इस फ़िल्म का बजट भी ठीक ठाक था, उस हिसाब से VFX नही हैं। लेकिन शायद इस तरह की फिल्मों के लिए नया प्रयोग है, अगर दर्शक देखेंगे और सराहेंगे, तो आगे जरूर बेहतर देखने को मिलेगा।

इसके अलावा कुछ और दृश्य हैं जो प्रभावित करते हैं।
1. रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गद्दार सिंधिया को ग्वालियर से निष्कासित करना, काफी जबरदस्त सीन है, और ये कुछ लोगो को तो दर्द देगा 😊
2. हर हर महादेव के नारे और भगवा ध्वज का बारंबार दिखना, कुछ को तो दर्द देगा।
3. बहुत ही कम लोगो को पता होगा कि रानी लक्ष्मीबाई को पढ़ने का काफी शौक था, और अंग्रेजी पर भी उन्हें महारत थी। फ़िल्म के कुछ दृश्यों में ये दिखाया गया है।
4. अपने पति की मृत्यु के बाद सिंहासन संभालने वाले दृश्य गजब है।
5. फ़िल्म में हमारे आपने लोगो की ही गद्दारी भी दिखाई गयी है, वरना अंग्रेज तो मुट्ठीभर ही थे, फिर भी सैकड़ो साल राज कर गए।

कुल मिलाकर बात ये है कि ऐसी फिल्मे देखिये, अपने बच्चो (8-18साल की उम्र) को जरूर दिखाइए। ऐसी फिल्मे बनेंगी, चलेंगी, तभी लोग अन्य किरदारों पर भी बनाएंगे। अभी तो ऐसे सैंकड़ो किरदार हैं जिनके बारे में कोई जानता नही।

लाखो नायक और नायिकाओं के बलिदान पर नेहरू-गांधी नाम का ‘चांदी का वर्क’ लगा कर ‘आजादी’ नाम की मिठाई हमें परोसी गयी है, जो चखने में मीठी तो लगती है…लेकिन मज़ा नही देती…..आज की आज़ादी के असली सूत्रधार तो अभी भी गुमनाम हैं।

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